रविवार, 25 नवंबर 2012

मुनव्वर राना जो उर्दू में गजल कहता है और हिंदी मुस्कुराती है।

अपने अंदाजे बयां के साथ मुनव्वर राना

26 नवंबर 1952 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली में पैदा हुऐ आलमी शोहरतयाफ्ता शायर मुनव्वर राना किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। इनके बुज़ुर्ग बरसों से रायबरेली में मदरसे में पढ़ाने का काम करते थे मगर जब मुल्क का बँटवारा हुआ तब मुनव्वर राना के दादा – दादी पकिस्तान चले गये और मुनव्वर राना के अब्बू मरहूम सैयद अनवर अली अपनी ज़मीं से मुहब्बत के चक्कर में पकिस्तान नहीं गये । हालात ने उनके हाथ में ट्रक का स्टेरिंग थमा दिया और इनकी माँ मजदूरी करने लगी अच्छा भला परिवार मुल्क के टुकड़े होने के बाद ग़ुरबत की चाद्दर में लिपट गया। ये वो दिन थे जब उनकी खेलने की उम्र थी लेकिन हालात ने मुनव्वर राना को बचपन में  ही जवान कर दिया। मुनव्वर राना ने अपनी किताब बदन सराय में लिखा है कि मेरे अब्बू ट्रक चलाते थक जाते थे उन्हें नींद आती थी और मुमकिन है उन्होंने बहुत से  ख़्वाब देखें हो मगर अम्मी से नींद कौसों दूर थी लिहाज़ा अम्मी ने कभी ख़्वाब नहीं देखे। मुनव्वर साहेब के वालिद ने 1964 में अपना ट्रांसपोर्ट का छोटा सा कारोबार कलकत्ते में शुरू किया और 1968 में मुनव्वर राना भी वालिद के पास रायबरेली से कलकत्ते आ गये ।  मुनव्वर साहब ने कलकत्ता के मोहम्मद जान स्कूल से हायर सेकेंडरी और उमेश चन्द्र कालेज से बी.कॉम.किया । इनके अब्बू शायरी के शौकीन थे सो शायरी की तरफ़ झुकाव वाज़िब था मुनव्वर साहब के वालिद नहीं चाहते थे कि वे शायर बने पर तक़दीर के लिखे को कौन टाल सकता है जदीद (आधुनिक ) शायरी को नया ज़ाविया जो मिलना था ग़ज़ल जो मैखाने से कभी बाहर नहीं निकली थी जो कोठों से कभी नीचे नहीं उतरी थी ,महबूब के गेसुओं में उलझी ग़ज़ल को नया आयाम जो मिलना था। मुनव्वर न चाहते हुए भी शायर हो गये, शुरूआती दिनों में वे प्रो. एज़ाज़ अफ़ज़ल साहेब से कलकत्ते में इस्लाह लेते  थे और उनका तख़ल्लुस था आतिश'  यानी क़लमी नाम था मुनव्वर अली'आतिश बाद में लखनऊ में उनकी मुलाक़ात वाली आसी साहेब से हुई जो मुनव्वर राना के बाकायदा उस्ताद हुए। मुनव्वर अली"आतिश"को नया नाम मुनव्वर राना उनके उस्ताद वाली आसी ने ही दिया मुनव्वर राना के बारे में वाली आसी साहब ने पीपल छांव में लिखा है कि वह जहां जाता है लोग उसे सर आंखों पर उठा लेते हैं वह सबका चहीता बन जाता है ये किसी एक शहर या कस्बे का किस्सा नहीं बल्कि पूरे हिंदुस्तान का यही हाल है फिर मैं सोचता हूं कि शोहरतें सबके मुकद्दर मैं कहां होती हैं ।
उन्हें शायरी और गजल से किस हद तक मौहब्बत है इस बात का अंदाजा सिर्फ इसी लगाया जा सकता है कि रायबरेली उनके घर का नाम भी गजल गांव रख दिया है और उन्होंने अपने ट्रांसपोर्ट का नाम भी गजल गजल ट्रांसपोर्च रखा है। सियासत पर तंज करते हुऐ मुनव्वर राना कहते हैं कि –
सियासत किस हुनर मंदी से सच्चाई छिपाती है
कि जैसे सिसकियों का दर्द शहनाई छिपाती है
उनसे मिलिये जो यहां फेरबदल वाले हैं
हमसे मत बोलिये हम लोग गजल वाले हैं।
उनकी शायरी में रिश्तों की एक ऐसी सुगंध है जो हर उम्र और हर वर्ग के आदमी के दिलो दिमाग़ पर छा जाती है। गज़ल जिसका शाब्दिक अर्थ है महबूब से बातचीत। अधिकतर शायरों ने औरत’ को सिर्फ़ महबूबा समझा। मगर मुनव्वर राना ने औरत को औरत समझा। औरत जो बहन है, बेटी है, और माँ होने के साथ साथ शरीके-हयात भी है। उनकी शायरी में रिश्तों के ये सभी रंग एक साथ मिलकर ज़िंदगी का इंद्रधनुष बनाते हैं। वे हिंदुस्तान के ऐसे अज़ीम-ओ-शान शायर हैं जिसने माँ’ की शख़्सियत को ऐसी बुलंदी दी है जो पूरी दुनिया में बेमिसाल है। माँ के लिए लिखे गये उनके शेर माँ की ममता के लहराते सागर से निकाले गये बेशकीमती मोती है जिन्हें उन्होंने माँ  नामक संकलन की अंजुलि में भर, दुनिया की हर माँ के चरणों में अर्पित कर दिया है। मुनव्वर राना कहते हैं कि ” मैं दुनिया के सबसे मुकद्दस और अज़ीम रिश्ते का प्रचार सिर्फ इसलिए करता हूँ कि अगर मेरे शेर पढ़ कर कोई भी बेटा माँ की खिदमत और ख्याल करने लगे तो शायद इसके बदले में मेरे कुछ गुनाहों का बोझ हल्का हो जाए
सच्ची शायरी के तरफदार मुनव्वर राना ने हमेशा घर आंगन की शायरी की है। जहां दुनिया भर के शायर औरत को सिर्फ महबूबा की नजर से देखते हैं वहीं मुनव्वर राना ने अपना महबूब अपनी माँ को माना है। उनकी शायरी में कैफी आजमी से लेकर अली सरदार जाफरी तक शामिल हैं। भूखा किसान , बहनों की राखी, मजदूर का पसीना, ट्रेन में झाड़ू लगाते बच्चे, बालू पर खेलते बच्चे, इन सब मौजू पर उसने शायरी की है। और यही वजह है कि ये सारी बातें उन्हें बाकी शायर से अलग बनाती हैं। गजल पढ़ते वक्त जब कभी कभी गुर्राई हुयी आवाज में राना का यह कहना कि आप दाद दें या ना दें मुझे मालूम है कि मैं शायर अच्छा हूं लोगों को तालियां बजाने पर मजबूर कर देता है। स्टेज पर पहुंचकर जब वो शेर सुनाता है तो यकायक लोगों की आंखें भीग जाती हैं। मुनव्वर राना ने सिर्फ माँ ही नहीं बल्कि जहां कहीं जुल्म हुआ वहां अपने अंदर के शायर को जिंदा रखा गुजरात में हुऐ नरसंहार पर 2002 में उन्होंने कहा कि
दुश्मनी ने काट दी सरहद पर सारी जिंदगी
दोस्ती गुजरात में रहकर मुहाजिर हो गई।
जमाने में बढ़ती हुयी फिरका परस्ती उन्हें सताती है, तकलीफ देती है, तो मुल्क की हिफाजत उन्हें इबादत के वक्त भी याद रहती है वतन से मौहब्बत देखनी हो तो उनका शेर देखीये।
मदीने तक में हमने मुल्क की खातिर दुआ मांगी
कोई ये पूछले इसको वतन का दर्द कहते हैं ।
या फिर
ये देख कर पतंगे भी हैरान हो गई
अब तो छतें भी हिंदु मुसलमान हो गई।
गंगा जमुनी तहजीब की इससे अच्छी मिसाल और क्या पेश की जा सकती है।
सगी बहनों का जो रिश्ता है हिंदी और उर्दू में
कहीं दुनिया की दो जिंदा जबानों में नहीं मिलता
वे आगे कहते हैं
लिपट जाता हूं माँ से और मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दू में गजल कहता हूं हिंदी मुस्कुराती है।
भाजपा, आरएसएस द्वारा मुसलमानों को पाकिस्तानी कहने पर उसके अंदर का शायर चीख पड़ता है और वह कह उठता है कि –
बदन में दौड़ता सारा लहु ईमान वाला है
मगर जालिम समझता है कि पाकिस्तान वाला है।
बस इतनी बात पर उसने हमें बलवाई लिक्खा है
हमारे घर के एक बर्तन पर आईएसआई लिक्खा है
माँ पर  कहे उनके शे'र पूरी दुनिया  में मक़बूल है :-----
चलती - फिरती हुई आँखों में अजाँ देखी है मैंने जन्नत तो नहीं देखी हैमाँ देखी है
तेरे दामन में सितारे हैं तो होंगे  फ़लक
मुझको अपनी माँ की मैली ओढ़नी अच्छी लगी
बुलंदियों का बड़े से बड़ा निशान छुआ उठाया गोद में माँ ने तो आसमान छुआ
ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता मैं जब तक घर  लौटूं मेरी माँ सजदे में रहती है
बटवारे के दर्द को मुनव्वर राना ने बखूबी समझा है और एक किताब की शक्ल में एक लंबी गजल जिसमें 500 शेर हैं लिख डाली। जो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान दोनों में खूब मकबूल हुयी मुनव्वर राना ने इस गजल में गांव, बस्ती, शहर, जंगल, जमीन, बचपन सभी का इस तरह जिक्र किया है कि पढ़ते वक्त आंखें का नम हो जाना लाजिमी हो जाता है।
मुहाजिर है मगर हम एक दुनिया छोड़ आये है तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आये है वुजू करने को जब भी बैठते है याद आता है
कि हम उजलत में जमुना का किनारा छोड़ आये है तयम्मुम के लिए मिट्टी भला किस मुंह से मांगें
कि हम शफ्फाक़ गंगा का किनारा छोड़ आये है हमें तारीख़ भी इक खान - मुजरिम में रखेगी
गले मस्जिद से मिलता एक शिवाला छोड़ आये है ये खुदगर्ज़ी का जज़्बा आज तक हमको रुलाता है
कि हम बेटे तो ले आये भतीजा छोड़ आये है  जाने कितने चेहरों को धुंआ करके चले आये 
 जाने कितनी आंखों को छलकता छोड़ आये है गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,इलाहाबाद में कैसा नाज़ारा छोड़ आए हैं शकर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी
कि हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आए हैं
मुनव्वर राना की अब तक 18 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें से 17 गजल संग्रह और एक गध है उन्होंने अपनी पहली प्रकाशित पुस्तक का नाम भी गजल गांव रखा , इसके अलावा मुहाजिरनामा,बगैर नक्शे का मकान, कहो जिल्ले इलाही से, फिर कबीर, पीपल छांव, मोर पांव, बदन सराय, माँ, सफेद जंगली कबूतर आदी उनकी प्रमुख कृतियों में से एक हैं। एक बार भाजपा सांसद तरुण विजय ने उन्हें राष्ट्र कवि घोषित करने की बात कही। लेकिन अफसोस राष्ट्र कवि तो दूर की बात हकूमत ने उन्हें आज तक किसी बड़े सम्मान से नहीं नवाजा। खुद मुनव्वर राना ने अपनी पुस्तक नये मौसम के फूल में इस दर्द को बयां करते हुए कहा कि उर्दू वालों ने मेरी शायरी, शख्सियत और किताबों को नजरअंदाज किया है। और असल दुख तो उस वक्त होता है जब हिंदी वाले भी मेरी किताबों के साथ सौतेला व्यवहार करते हैं।

रविवार, 11 नवंबर 2012

दीवाली से गायब दीप


दीवाली से गायब दीप
हर बार की तरह इस बार भी दीपों का त्योहार दीपावली आ गया। ना जाने इस एक साल के कालचक्र में हम में से कितने ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपनों को इस बीच खोया है। लेकिन वक्त की उन कड़वीं यादों को भूल कर हम दीवाली मनाऐं। सवाल दीवाली का हो और उसमें दीप ना हों तो कैसा लगेगा ? मुझे याद है हमारे गांव में लोग दो तरह की दीवाली मनाते थे यानि कि एक छोटी दीवाली और एक बड़ी दीवाली दोनों ही दिन गांव के प्रत्येक घर की मुडेरों पर दिये जलाये जाते थे वो दिये मिट्टी के बने होते थे जिन्हें गांव की देशी भाषा में दीबला कहा जाता है। अब कुछ वर्षों से हम इलैक्ट्रॉनिक बल्ब का इस्तेमाल का करते हैं हद तो यह कि अब इसका इस्तेमाल ग्रमीण क्षेत्रों में भी हो रहा है। किसी बुजुर्ग के मुंह से सुना था कि दीये की गंध से पर्यावरण में फैली गंदी हवा पाक साफ हो जाती। ठीक उसी तरह जिस तरह एक चम्मच देशी घी 100 मीटर के दायरे को प्रदूषण रहित कर देता है। दीवाली पर जब दिये जलाये जाते थे तब शहर हो या गांव लोगों को सांस लेने में घुटन महसूस नहीं होती थी। लेकिन अब पटाखों की गंध आंखों में चुभन पैदा कर देती है। दीपों के त्यौहार पर ना जाने कितने करोड़ रुपया का बारूद स्वाहा हो जाता है जो वातावरण में अलावा प्रदूषण के कुछ और नहीं करता। उधर, दीबले बनाने वाले कुम्हार अब उंगलियों पर गिने जा सकते हैं जिनके बनाये दीबलों से शहर का गांव का वातावरण शुद्ध होता था अब वे भी आधुनिकता के इस दौर में रोजी रोटी कमाने के लिये कोई और धंधा अख्तियार कर चुके हैं। जबकि मिट्टी का बर्तन हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। लेकिन इस इलैक्ट्रॉनिक दीवाली में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली है।
पहले घर घर दीप जलते थे और लोग बहुत कमी से खतरनाक बीमारियों से सामना करते थे। आधुनिक युग की नई ऩई बीमारियां डेंगू, इंसेफ्लाईटिस, शुगर, आदी जैसी खतरनाक बीमारियां उस वक्त नहीं थी। और तो और शहर में एक या दो अस्पताल होता था और गांव में तो सिर्फ एक हकीम जी वैध जी हुआ करते थे जिनके पास तमाम बीमारियों का इलाज था। लेकिन अब जगह जगह डॉक्टर और अस्पताल हैं फिर भी आधे से ज्यादा लोग बीमार दिखाई पड़ते हैं। समय बदला अब मौसमी फूल नहीं कागजी फूल मिलते हैं मिट्टी के बने दिये नहीं विधुत झालर घरों की शोभा बढ़ाती हैं। जिस तरह इंसान का संस्कृति से मोह भंग हो रहा है उसी तरह आपस का प्रेम व भाईचारा भी खत्म हो रहा है। भाग दोड़ भरी इस जिंदगी में सबको रेडीमेड माल चाहिये त्योहार का मतलब सिर्फ खरीदारी बनकर रह गया है। होला या दीवाली, ईद हो या क्रिसमस कार्पोरेट घरानों की इसमें चांदी काट रहे हैं
वसीम अकरम - 9927972718


शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

कुछ सवाल देश की जनता से


कुछ सवाल देश की जनता से
किसकी नजर लग गई मेरे वतन को जब ईद उल फितर आई थी तो असम समेत देश के कई हिस्सो में नफरतों के शोले भड़क रहे थे । अब ईद उल जुहा आई है तो फैजाबाद जल उठा। आखिर कौन हैं वे लोग जो अम्न के दुश्मन हैं जो पहरेदारियों को धता बताते हुए जहर घोलने में काम हो जाते हैं। अब तो हर त्यौहार पर डर रहता है कि कहीं इंसानियत का खून ना बह जाये कहीं फिर रिश्ते तार तार ना हो जायें । क्योंकि कथित मजहबी मजदूर मौके की तलाश में रहते हैं उन्हें मौका चाहिये होता है जहर घोलने का। जबकि त्यौहार तो आपसी सोहार्द के लिये होते हैं फिर इन पर खून खराबा क्यों ? अगर लड़ाई ही करनी है तो उसके लिये मुद्दे बहुत हैं उन पर लड़ो बेरोजगारी है भुखमरी है भ्रष्टाचार है इन मुद्दो पर क्यों खून नहीं खोलता ? मुझे हैरानी होती है दंगो की खबर सुनकर हैरानी इस लिये कि । भारत में रामलीला में दहन के लिये रावण का पुतला मुसलमान बनाते हैं दीपावली के पटाखों से लेकर होली की पिचकारी तक सबमें एक दूसरे की भागीदारी होती है । फिर भी दंगा हो जाता है क्यो ?  
मेरे देशवासियों अभी वक्त है समझ जाईये अपने बोद्धिक स्तर को ऊपर उठाईये हालात को बदला जा सकता है जगह जगह फूट और हिंसा का ही फायदा उठाया था अंग्रेजो ने और 250 साल टिक गये। अब इस फूट का फायदा मौजूदा सरकार उठा रहीं हैं पिछले 65 सालों से और उठाती रहेंगी उन्हें मालूम है अपनी जनता का बोद्धिक स्तर बकौल मुनव्वर राना
तवायफ की तरह अपनी गलतकारी चेहरों पर
हकूमत मंदिरों मस्जिद का झगड़ा डाल देती है
जगह - जगह हिंसा, दंगा, लूट, आगजनी हमें अपने पड़ोसी देशों से सबक लेना चाहिये पाकिस्तान को देखों, अफगानिस्तान को देखो क्या बच गया वहां पर ? वहां भी धर्मांधता की लड़ाई है रोजाना सैंकड़ों जानें धर्म की बलि चढ़ जाती हैं। और अब यही यहां पर हो रहा है जरा सी बात पर खून सड़को पर बह जाता है। बेनजीर भुट्टो की शहादत पर वसीम बरेलवी ने कहा था ....
ये नफरत है जिसे लम्हे में दुनिया जान लेती है
मौहब्बत का पता लगते जमाने बीत जाते हैं ।


शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

आपका ऐजेंडा क्या है नेता जी



पिछले दिनों जब पूर्व राज्य सभा सांसद व पत्रकार शाहिद सिद्दिक़ीने नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू लिया था तो सपा ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया , उस वक्त भी मैंने यह सवाल उठाया था कि जब गुजरात के ब्रांड अंबेसेडर अमिताभ बच्चन की पत्नि जया बच्चन सपा से बाहर नहीं निकाली गई तो फिर शाहिद सिद्दिकी को ही क्यों बाहर निकाला गया मगर आपने शाहिद को बाहर निकाल कर तो उसके कार्य की सजा उन्हें दे दी मगर आप को सजा कौन दे आपके पास तो अपनी पार्टी सिंबल है आपको तो बस जनता ही सजा दे सकती है । जो 2014 में होने जा रहा है आपका मुस्लिम प्रेम इस तस्वीर में साफ दिखाई दे रहा है जिसमें आप उसी मोदी से हाथ मिला रहे हैं जिसका साक्षात्कार करने पर आपने शाहिद सिद्दिकी को बाहर का रास्ता दिखाया था । क्या शाहिद सिद्दिकी को निकालने का सपा पहले ही मसौदा तैयार कर चुकी थी क्योंकि शाहिद सिद्दिकी पहले सपा में थे फिर बसपा में गये वहां उन्होंने बिजनौर लोक सभा सीट से चुनाव लड़ा जिसमें हार का सामना करना पड़ा फिर लोकदल में आगये केवल इस गरज से कि उन्हें कोई ना कोई बड़ा पद मिल जायेगा लेकिन जब वहां भी दाल ना गली तो फिर से सपा का दामन थामा और यूपी चुनाव के दौरान सपा का खूब प्रचार किया । जब यूपी में सपा को बहुमत हासिल हो गया तो सपा को लगा कि अब शाहिद सिद्दिकी को राज्य सभा भेजना पड़ेगा जो सपा चाहती नहीं थी इसीलिये शाहिद को बकरा बनाना पड़ा । लेकिन आपका मुस्लिम प्रेम और मोदी प्रेम किसी से छिपा नहीं है । सपा ने कहने को आजम खान को वरीयता दी है लेकिन जो लाभ के पद थे जैसे शिक्षा मंत्रालय अखिलेश यादव ने अपने पास रखे ताकि इसमें आजम खाँ का कोई हस्तक्षेप ना रहे । यानी जो भी उर्दू अध्यापकों की भर्ती हो उसमें यादवों को ही ठूंसा जाये एसा ही सपा के पिछले शासनकाल में हुआ था जिन पर उर्दू लिखना तक नहीं आता था उन्हें उर्दू अध्यापक नियुक्त किया गया जो आज भी कार्यरत हैं । आपके मोदी से हाथ मिलाने किसी को आपत्ती नहीं मगर जब यही कार्य एक पत्रकार नेता करे तो आप उसे बाहर करें यह तो सरासर बेमानी है नेताजी है । आप कल्याण सिंह गोद में बैठे , आपने साक्षी महाराज को राज्य सभा भेजा । लेकिन फिर भी आप ढ़ोंग करते हैं कि सपा सेक्यूलर है भला कैसे क्या इस तरह कि कुंडा ( प्रताप गढ़ )में निशाना बनाकर मुसलामानों के साथ लूट पाट की गई जान व माल का नुकसान पहुंचाया गया लेकिन कार्रावाई किस पर हुई आप यह भी जानते होंगे । सपा के कद्दावर नेता आजम खाँ मेरठ में सरेआम शहर काजी की तोहीन करें और आपने उन पर कोई एक्शन नहीं लिया क्या ये है आपका मुस्लिम प्रेम व सैक्यूलरज्मि मायावती की मूर्ती टूटती है 24 घंटे में लग जाती है मगर मलियाना हाशिमपुरा के 1987 के दंगा पीड़ि आज भी न्याय की तलाश में कोर्ट कचहरियों के चक्कर लगा रहे हैं कमसे कम उनकी तो सुनी जाती । मगर नहीं आपको 2014 दिख रहा है यानी गोद के छोड़कर आप जो पेट में है उसकी आस लगाये बैठे हैं मगर पहले गोद वालो की तो हिफाजात करो अगर इनकी आप ठीक से हिफाजत कर पाये तो पेट का यानी 2014 भी सपा का होगा और अगर इसमें अगर कहीं पर चूक हुई तो आपसे उत्तर प्रदेश भी जाता रहेगा । आपने जिस मोदी का सहारा लेकर शाहिद को बाहर किया है उसी मोदी से आप गले मिलो इसे कोई भी सैक्यूलर इंसान बर्दाश्त नहीं करेगा ।

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

ऐ मौत तूने मुझको ज़मींदार कर दिया



50 साल से उर्दू अदब की खिदमत करने वाले मशहूर शायर मुजफ्फर रज्मी का पिछले माह 19 सितंबर को निधन हो गया वे 76 साल के थे । मुजफ्फर रज्मी का जन्म शामली के कैराना में 1 अगस्त 1936 को हुआ था । घर वालों ने इनका नाम मुजफ्फर इस्लाम रखा जो शायर बनने के बाद मुजफ्फर रज्मी हो गया । और फिर इसी नाम ने मुजफ्फरनगर के कैराना को विश्व में पहचान दिलाई । लेकिन रज्मी साहब अपनों के बीच गुमनाम जिंदगी जीते रहे। पूरा जीवन मुल्क की खिदमत करने बावजूद हिंदुस्तानी सरकार ने उन्हें काई भी पुरस्कार नहीं दिया। हालांकि मुजफ्फर रज़्मी को 2011 में जिला प्रशासन मुजफ्फरनगर द्वारा फख्रे मुजफ्फरनगर पुरस्कार से पचास हजार रुपए की आर्थिक सहायता देकर जरूर सम्मानित किया गया था।
फकीराना अंदाज में जिंदगी गुजारने वाले मुजफ्फर रज्मी ने यूं तो 50 साल तक शायरी की और सिर्फ शायरी के लिये ही जिये लेकिन जितनी मकबूलियत उनके इस शेर ने हासिल की वह उनके किसी शेर को नहीं मिली यानी कि सदि के 100 चुनिंदा शेर में उनका यह शेर भी शामिल हो गया ।
वो ज़ब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई।

1974 में उनका यह शेर जब पहली बार ऑल इंडिया रेडियो से ब्राडकास्ट हुआ, तो मुल्क भर में आम फेम शेर बन गया। आल इंडिया रेडियो से बाडकास्ट होने के बाद सबसे पहले इस शेर को अपनी तकरीर में जम्मू-कशमीर के पूर्व मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला ने पढ़ा। इसके बाद तो शेर मकबूलियत की बुलंदी पर पहुंचता रहा। दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की शवयात्रा के दौरान टीवी कमेंट्रेटर कमलेश्वर ने यह शेर बार बार दोहराया। इन्द्र कुमार गुजराल ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद इस शेर को अपने संबोधन में प्रयोग किया। मौजूदा प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने इस शेर को अपने संबोधन में पढ़ा है। यह शेर लोकसभा की कार्यवाही में दर्ज है। जिसे कई संसद सदस्यों ने अनेक अवसरों पर प्रयोग किया है। सियासी गलियारों तक पहुंचने के बाद इस शेर को अपने अपने तरीके से पेश करते हुए कुछ कथित शायरों ने इसे अपना बताने का सिलसिला छेड़ दिया। औ कई किताबों में इस तरह पेश भी किया। हालांकि मीडिया से जुड़े खैरख्वाह और जाति कोशिश के चलते शेर की हिफाजत की जा सकी। खुशी और तसल्ली इस बात की है कि जहां लोग शेर को जानते हैं, वहीं शेर के खालिक के रूप में मुजफ्फर रजमी का नाम भी जानते हैं।
मुजफ्फर रज्मी ने हमेशा समाजी मसाईल पर शायरी की उनकी शायरी में भूख के अहसास हैं फाकों से भरी जिंदगी है । आज के दौर में शायरी जब एक पेशा बन गई है इस दौर में भी उन्होंने अपने आपको प्रोफेशनलिज्म को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और एक गुमनाम सी जिंदगी बसर करके गुजर गये । सच्चाई का अलंबरदार लम्हों के तीरों से छलनी होकर मरते.मरते सदियों का नारा बन जाता है। रज़्मी ने जदीद शायरी की धुन में बुजुर्गो की रिवायत से कभी बगावत नहीं की। नामचीन शायर राहत इंदौरी ने एक बार कहा था कि रज्मी साहब मुशायरों में रिवायती और क्लासिकी ग़ज़ल की जान थे। रज़्मी साहब खुमार बाराबंकीए अलम मुज़फ़्फ़रनगरी और मुशीर ङिांझानवी की कड़ी के शायर थे। जिंदगीभर उर्दू अब की खिदमत करने वाले रज़्मी की अपने आशियाने की इच्छा उन्हीं के साथ चली गई। अपनी खुद्दारी के चलते उन्होंने किसी के सामने अपने हाथ नहीं फैलाया। घर में उनके तीन बेटों के अलावा उनकी एक पुत्री है। पुत्री के निकाह की इच्छा और अपनी छत की इच्छा लिए वह इस दुनिया से रुखसत हो गए। और कह गये कि ......
मेरे दामन में अगर कुछ न रहेगा बाकी
अगली नस्लों को दुआ देके चला जाऊंगा।
रज्मी साहब के तीन गजल संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें से एक किताब का विमोचन डा. मनमोहन सिंह ने 2004 में प्रधानमंत्री कार्यालय में किया । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मुजफ्फर रज़्मी की शायरी के मुरीद थे। प्रधानमंत्री से उनकी दो बार मुलाकात हो चुकी थी। उनकी सादगी और शायराना अंदाज के कायल प्रधानमंत्री ने तीसरी बार उनसे मिलने की इच्छा जताई थी। एक माह पूर्व ही पीएमओ कार्यालय से उनके पास कल आई थी। रज्मी को दो दिन बाद अमेरिका जाना था जहां पर वे कई मुशायरे में शिरकत करते लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था । मुजफ्फर रज़मी वर्ष 1996 में नगरपालिका परिषद रूड़की से सेवानिवृत हुए थे तथा वह वर्ष 1991 में कैराना नगरपालिका परिषद में कार्यालय अधीक्षक पद पर कार्यरत रहे। लेकिन जिंदगी भर एक आशियाने की उन्हें दरकार रही जो उन्हें आखिरी वक्त तक भी नहीं मिल पाया। लेकिन उनके सोच और फ़िक्र की गली से लेकर संसद तक हमेशा हुकूमत रहेगी। अब रज्मी साहब तो रहे नहीं लेकिन उनकी शायरी हमें वक्ती मसायल पर हमेशा याद आती रहेगी और रज्मी को खिराजे अकीदत उनके ही शेर के साथ क्योंकि अब उन्हें मौत ने जमींदार कर दिया है अब वे भी दो गज जमीं के मालिक हैं ।
कश्ती तेरा नसीब चमकदार कर दिया
इस पार के थपेड़ों ने उस पार कर दिया।
दो ग़ज़ सही मगर ये भी मिल्कियत तो है
ऐ मौत तूने मुझको ज़मींदार कर दिया।
वसीम अकरम
साधना न्यूज़ सी 457 नोएडा सैक्टर 10
मोबाईल 09927972718
Email addressjournalistwasimakram@gmail.com




रविवार, 26 अगस्त 2012

संघ की जुबान बोलनी बंद करे मीडिया


आपका ऐजेंडा क्या है नेता जी ?


आपका ऐजेंडा क्या है नेता जी ?

पिछले दिनों जब पूर्व राज्य सभा सांसद व पत्रकार शाहिद सिद्दिक़ीने नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू लिया था तो सपा ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया , उस वक्त भी मैंने यह सवाल उठाया था कि जब गुजरात के ब्रांड अंबेसेडर अमिताभ बच्चन की पत्नि जया बच्चन सपा से बाहर नहीं निकाली गई तो फिर शाहिद सिद्दिकी को ही क्यों बाहर निकाला गया ? मगर आपने शाहिद को बाहर निकाल कर तो उसके कार्य की सजा उन्हें दे दी मगर आप को सजा कौन दे ? आपके पास तो अपनी पार्टी सिंबल है आपको तो बस जनता ही सजा दे सकती है । जो 2014 में होने जा रहा है आपका मुस्लिम प्रेम इस तस्वीर में साफ दिखाई दे रहा है जिसमें आप उसी मोदी से हाथ मिला रहे हैं जिसका साक्षात्कार करने पर आपने शाहिद सिद्दिकी को बाहर का रास्ता दिखाया था । क्या शाहिद सिद्दिकी को निकालने का सपा पहले ही मसौदा तैयार कर चुकी थी ? क्योंकि शाहिद सिद्दिकी पहले सपा में थे फिर बसपा में गये वहां उन्होंने बिजनौर लोक सभा सीट से चुनाव लड़ा जिसमें हार का सामना करना पड़ा फिर लोकदल में आगये केवल इस गरज से कि उन्हें कोई ना कोई बड़ा पद मिल जायेगा लेकिन जब वहां भी दाल ना गली तो फिर से सपा का दामन थामा और यूपी चुनाव के दौरान सपा का खूब प्रचार किया । जब यूपी में सपा को बहुमत हासिल हो गया तो सपा को लगा कि अब शाहिद सिद्दिकी को राज्य सभा भेजना पड़ेगा जो सपा चाहती नहीं थी इसीलिये शाहिद को बकरा बनाना पड़ा । लेकिन आपका मुस्लिम प्रेम और मोदी प्रेम किसी से छिपा नहीं है । सपा ने कहने को आजम खान को वरीयता दी है लेकिन जो लाभ के पद थे जैसे शिक्षा मंत्रालय अखिलेश यादव ने अपने पास रखे ताकि इसमें आजम खाँ का कोई हस्तक्षेप ना रहे । यानी जो भी उर्दू अध्यापकों की भर्ती हो उसमें यादवों को ही ठूंसा जाये एसा ही सपा के पिछले शासनकाल में हुआ था जिन पर उर्दू लिखना तक नहीं आता था उन्हें उर्दू अध्यापक नियुक्त किया गया जो आज भी कार्यरत हैं । आपके मोदी से हाथ मिलाने किसी को आपत्ती नहीं मगर जब यही कार्य एक पत्रकार नेता करे तो आप उसे बाहर करें यह तो सरासर बेमानी है नेताजी है । आप कल्याण सिंह गोद में बैठे , आपने साक्षी महाराज को राज्य सभा भेजा । लेकिन फिर भी आप ढ़ोंग करते हैं कि सपा सेक्यूलर है भला कैसे ? क्या इस तरह कि कुंडा ( प्रताप गढ़ )में निशाना बनाकर मुसलामानों के साथ लूट पाट की गई जान व माल का नुकसान पहुंचाया गया ? लेकिन कार्रावाई किस पर हुई आप यह भी जानते होंगे । सपा के कद्दावर नेता आजम खाँ मेरठ में सरेआम शहर काजी की तोहीन करें और आपने उन पर कोई एक्शन नहीं लिया क्या ये है आपका मुस्लिम प्रेम व सैक्यूलरज्मि ? मायावती की मूर्ती टूटती है 24 घंटे में लग जाती है मगर मलियाना हाशिमपुरा के 1987 के दंगा पीड़ि आज भी न्याय की तलाश में कोर्ट कचहरियों के चक्कर लगा रहे हैं कमसे कम उनकी तो सुनी जाती । मगर नहीं आपको 2014 दिख रहा है यानी गोद के छोड़कर आप जो पेट में है उसकी आस लगाये बैठे हैं मगर पहले गोद वालो की तो हिफाजात करो अगर इनकी आप ठीक से हिफाजत कर पाये तो पेट का यानी 2014 भी सपा का होगा और अगर इसमें अगर कहीं पर चूक हुई तो आपसे उत्तर प्रदेश भी जाता रहेगा । आपने जिस मोदी का सहारा लेकर शाहिद को बाहर किया है उसी मोदी से आप गले मिलो इसे कोई भी सैक्यूलर इंसान बर्दाश्त नहीं करेगा ।